Wednesday, 16 March 2016

गुरू घासीदास जी के वंश विस्तार :-


गुरू घासीदास एवं माता सफुरा से तीन पुत्र एवं एक पुत्री हुआ। 

वंश वृक्ष 
1. अमरदास जी बाल्यवस्था में जंगल से वापस नहीं लौटे।
2. बालकदास जी का एक पुत्र साहेबदास हुआ। बालकदास जी की हत्या कर दी गई।
3. आगरदास जी को सन् 1875 में एक पुत्र प्राप्त हुआ उनका नाम अग्रमनदास था।
4. सुभद्रा माता का विवाह हो गया। 
गरू आगरदास जी का विवाह कनुका माता से हुआ था। उसी समय अपने बड़े भाई गुरू बालकदास की (विधवा) पत्नि राधा माता जी को स्वीकार कर लिया। जिनसे सन् 1876 में एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम अजबदास रखा गया।
अजबदास का विवाह गायत्री माता से हुआ इनसे गुरू अतिबलदास बाबा जी का जन्म सन् 1894 ई. में हुआ। राधा माता ने अपने विवाहित पति गुरू बालकदास जी के संयोग से उत्पन्न पुत्र गुरू साहेब दास की विवाहित पत्नि कर्री माता को गुरू अजबदास जी को स्वीकार कराई। जिनके संयोग से गुरू मुक्तावनदास जी का जन्म सन 1898 एवं गुरू जगतारनदास जी का सन् 1901 ई. में जन्म हुआ।
गुरू मुक्तावनदास एवं ललीता माता जी से प्रथम पुत्र अम्रदास जी और अम्रदास एवं मीना के संयोग से गुरू धर्मदास एवं गुरू गोविंद दास।
द्वितीय पुत्र बालदास जी एवं रूकमणी माता के संयोग से गुरू ढालदास (आगे और भी वंशज हैं।
तृतीय पुत्र नवरत्न दास एवं संत माता के संयोग से भी वंश वृद्धि हुए।
गुरू जगतारन दाज जी एवं कृती माता जी के संयांग से 3 पुत्र हुए -
(1) गुरू जगमोहन दास एवं फिरतीन माता के संयोग से सेवनदास, उत्तमदास एवं नेमनदास आगे वंशज और भी है .... 
(2) गुरू मनमोहन दास एवं माता संत कुमारी से देउमनदास व सतखोजन दास जी। 
(3) गुरू दयावंत दास एवं एम.माता के संयोग से पालकदास, द्वारिका दास, देवेन्द्रदास सुपुत्र हुए ।
गुरू अतिबलदास एवं भगवंतीन माता के संयोग से तीन पुत्र हुए -
1) प्रकाशदास पत्नि पुराईन माता निर्वंशी रहे।
2) गुरू अबारनदास पत्नि गुलाब माता से दो पुत्र- प्रथम संतनदास एवं द्वितीय आशकरण दास जी
3) सुखनंदनदास पत्नि सुहागा माता की गोद से मकसुदनदास गुरू एवं अजयदास गुरू उत्पन्न हुए।
गुरू संतनदास जी के पुत्र प्रथम गुरू मुक्ति दास एवं द्वितीय पुत्र शक्तिदास जी
गुरू आशकरण दास जी को तीन संतान हुआ- प्रथम गुरू आसमदास, द्वितीय पुत्र फलदास एवं तृतीय मनहरणदास
गुरू अम्तमनदास एवं कनुका माता जी से गुरू अगमदास जी का जन्म हुआ। अगमदास जी का पूर्णिमा माता के साथ विवाह सन् 1915 मंे हुआ था। 1927 में माता सुमरीत के साथ उनका दुसरा विवाह हुआ। जिसमें मंतरा नामक एक पुत्री का जन्म हुआ था। तीसरा विवाह असम के मीनी माता से सन् 1932 में हुआ था और चैथा विवाह केवटा डबरी के माल गुजार रतिराम की सुपुत्री करूणा माता के साथ हुआ था जिनसे विजय गुरू उर्फ अग्रनामदास बाबा जी का जन्म हुआ। विजय गुरू एवं कौशल माता से गुरू रूद्रकुमार जी का जन्म हुआ आगे वंश जारी है।

सतनाम पंथ उद्भव इतिहास...


ऐतिहासिक प्रणाम के अनुसार मानव सभ्यता का विकास की शुरूआत 5000 ई.पू. से हुई जो कालांतर में 3000 ई.पू. से विकसीत अवस्था में पहुंच चुकी थी जिसे सिंधु घाटी की सभ्यता कहा जाता है। उस समय सुमेरियन सभ्यता एवं हड़प्पा कालिन सभ्यता में विभिन्न संस्कृतियों का प्रचलन था जिसमें सतपंथ संस्कृति का प्रचलन प्रमुख रूप से हुआ। उस काल में सतपंथ के अनुयायीयों के द्वारा सतमार्ग पर चलना, परमार्थ, निःस्वार्थ, सत्य-अहिंसा, सरलता, सहजता, सात्विक जीवन शैली एवं सतनाम का जाप किया जाता था। सतनाम पंथ संस्कृति का प्रचलन मानव सृष्टि की रचना से आज तक विभिन्न कालों से गुजरता हुआ विभिन्न राज्य राजाओं, ऋषियों मुनियांे, तपस्वी, ज्ञानी, त्यागी एवं संत जनांे के माध्यम से चलता आ रहा है एवं अनेक कष्टों को सहते हुए सतमार्ग का अनुसरण करते आ रहे है तथा संपतंथ पर चलते हुए अमरत्व प्राप्त कर रहे हैं।
इसी कड़ी में परम पुज्य गुरू घासीदास जी छत्तीसगढ़ की धरती पर अवतरित ऐसे युग-पुरूष हैं, जिन्होेंने समाज में नई चेतना का उद्भव कर सामाजिक क्रांति लाये। सामाजिक असमानता, आर्थिक शोषण, अत्याचार, छुआछुत, नारी उत्पीड़न आदि के विरूद्ध उन्होंने सन् 1820 से 1830 तक भारी आंदोलन चलाया उनके इस सतनाम आंदोलन में लगभग 4 लाख से अधिक लोग शामिल हो गये तथा सतनाम धर्म का पुर्नस्थापना किया। जो कि औरंगजेब के शासन काल में मृतप्राय हो चुका था। सतनाम धर्म में छत्तीसगढ़ क्षेत्र के दबे-कुचले, पीडि़त मानव समाज बड़ी संख्या में शामिल हुए यहीं आगे चलकर सतनाम धर्म पालन करते हुए आज भी इस धर्म को उजागर किये हुए हैं। इस धर्म के अनुयायियों का विस्तार छत्तीसगढ़ के बाहर नहीं होने का अनेकों कारण नजर आते हैं। जैसे-
01. तत्कालीन इतिहासकार, साहित्यकार, कवि एवं लेखकों ने गुरू घासीदास के इस सतनाम आंदोलन को लेखनीबद्ध नहीं किया अथवा जानबुझकर प्रचार-प्रसार नहीं होने दिया।
02. गुरू घासीदास जी स्वयं स्कूली शिक्षा से वंचित रहे। 
03. तत्कालीन राजा महाराजाओं का दबाव तथा वर्चस्व का कामम होना।
04. गुरू घासीदास जी का नेतृत्व बर्दास्त नहीं करना।
05. गुरू घासीदास जी का आंदोलन तत्कालीन सामाजिक असमानता (कुरितियों) के खिलाफ था, आदि अनेक कारणों से उनका यह आंदोलन सिमित रहा।

संतनामी वंशावली:-
आदि काल ते है सतपंथा । सत के कबहु होय न अंता ।।
                                                                           (नामामण ग्रंथ)
सत्रहवीं शताब्दी में संत पवित्रदास एवं उनके प्रमुख शिष्य एवं उनके अनुयायियों ने मुगल शासक औरंगजेब के पंथ-विरोधी एवं जबरन इस्लाम धर्म अपनाने हेतु गतिविधियों से तंग आकर सन् 1672 ई. में उसके विरूद्ध आंदोलन शुरू कर दिया। जो भारत के इतिहास में ‘‘सतनामी विद्रोह’’ के नाम से जाना जाता है। 
औरंगजेब के दमनकारी नीति से त्रस्त होकर सतनामियों का विशाल समुह उत्तर भारत को छोड़कर बिहार, उड़ीसा, कालाहांडी से होते हुए छत्तीसगढ़ में आकर बस गये।
छत्तीसगढ़ के वनांचल एवं महानदी के आस-पास के क्षेत्रों में सतखोजन दास के वंशज शगुनदास, दयालदास, मेदनीदास भटगांव में निवास कर रहे थे। उस समय छत्तीसगढ़ में सामंति राज व्यवस्था, जमीदारी प्रथा लागु था। बाद में मेदनीदास अपनी पत्नि मायावती एवं पुत्र महंगुदास को लेकर गिरौदपुरी में आकर बस गये। यहीं पर परमपूज्य गुरू घासीदास जी का जन्म हुआ।
मेदनीदास और मायावती भटगांव से आकर गिरौद में बस गये। उनके पुत्र हुए महंगुदास जी उनका विवाह मड़वा गांव में पुराईन गोत्र की युवती अमरौतिन से हुआ महंगुदास एवं अमरौतिन माता के गोद से ननकु नाम का पुत्र हुआ (सन् 1750) में दुसरा पुत्र मनकुदास जी का जन्म सन् 1753 में तथा तिसरे पुत्र गुरू घासीदास जी का जन्म 1756 में हुआ। ननकुदास जी बाल्यकाल में ही सत्य में विलिन हो गये अर्थात मनकु और घासीदास दो पुत्र का वंश विस्तार जग प्रमाणित और सुरक्षित है। मनकुदास जी का विवाह ग्राम दाऊबंधान थाना व तहसील बिलाईगढ़ के कन्या ज्ञानमति के साथ हुआ था। जिसमें 23 जुलाई 1788 में पुत्र बंधनदास का जन्म हुआ।
बंधनदास का विवाह ग्राम नरधा के (पीरती) के साथ हुआ उनके संयोग से छह पुत्र का जन्म हआ जो निम्न हैं -
1. झिंगुटदास जन्म सन् 1808 इनकी पत्नि बोधिन माता।
2. आगरदास का जन्म सन् 1811 इनकी पत्नि आरती माता।
3. अंजोरदास का जन्म सन् 1815 इनकी पत्नि माता सुन्दरमति।
4. खुलाऊदास का जन्म सन् 1818 इनकी पत्नि मिलउतीन माता।
5. धनीदास का जन्म सन 1822 इनकी पत्नि सुखीन माता।
6. बोधनदास का जन्म सन् 1825 इनकी पत्नि बद्रीका माता।
झिंगुटदास के पुत्र सरधा का जन्म 1825 गिरौद में हुआ। उनका वंश विस्तार वर्तमान में सिर्री (पामगढ़) में निवासरत है।
अंजोरदास के 2 पुत्र हुए 1834 में बरखंड़ी (दर्राहा) तथा दुसरा सन् 1836 में कालिदास का जन्म हुआ। वर्तमान में बरखंड़ी का वंश ग्राम सेमरा (नवागढ़) में एवं कालिदास जी का वंश ग्राम भेड़ीकोन्हा, गोईदबंद, सलिहा, खैरझिटी में निवासरत है।
आगरदास के चार पुत्र हुए- 1) गंगाराम जन्म 1830   2) करिया दर्राहा जन्म 1832   3) अंतदास दर्राहा जन्म 1835    4) दर्शनदास छोटे दर्राहा का जन्म सन 1838 में हुआ ये लोग सन् 1845 को गिरौद (दर्रा) छोड़कर ग्राम सिर्री (पामगढ़) और मुड़पार में आकर बस गये।
बोधनदास से एक पुत्र महलदास का जन्म हुआ।
संत खुलाऊदास के एक पुत्र हुए सन 1852 ई. में जिनका नाम घसियादास रखा गया।
वर्तमान में संत पिरोहिलदास जी ग्राम सिर्री, पोस्ट ससहा, व्हाया-पामगढ़ पिन नं. 495553 जिला- जांजगीर-चांपा में निवास करते हैं और सत्संग, धर्म प्रचार-प्रसार एवं गुरूवाणी संत उपदेश आमजनों को देते रहते हैं।

छत्तीसगढ़ में सतनामियों का आगमन...


ऐसा माना जाता है कि सतनामी समाज के पूर्वज सम्राट औरंगजेब के हुकुमत से तंग होकर एवं उसेक आदेशानुसार भारत देश के दक्षिण पथ महाकौशल छत्तीसगढ़ में आकर बस गये। किन्तु यहां के जमीदारी, सांमत शाही शासन, रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल, धर्म-संस्कृति, रिति-रिवाज को देखकर, सतनामी समाज के लोग विभिन्न जिलों में अलग-अलग गांव में बसने लगे और अपने सुविधा के लिए मुहल्ला, पारा, नहाने के लिए तालाब में अलग घाट, मृत्यु संस्कार के लिए अलग शमशान घाट बनाकर रहने लगे। पूजा अराधना के लिए अलग गरूद्वारा बनाकर श्वेत धर्म ध्वजा फहराने लगे। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में जाकर सतनामी लोग स्वतंत्रता पूर्वक बसने लगे और अपने इच्छानुसार कृषि योग्य जमीन बनाकर खेती-किसानी करने लगे।
इसी प्रकार सतनामी समाज के लोग छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिला यथा- रायगढ़, सारंगढ़, जांजगीर, कोरबा, बिलासपुर, मुंगेली, बलौदाबाजार, तिल्दा, रायपुर, दुर्ग, कवर्धा, बेमेतरा, राजनांदगांव, बालोद, धमतरी, महासमुन्द, डोंगरगढ़, कांकेर, कोण्डागांव एवं बस्तर में जाकर बस गये एवं स्वतंत्रता पूर्वक रहते हुए काश्तकारी करने लगे। आज इनकी जनसंख्या छत्तीसगढ़ में लगभग 44 लाख से अधिक है।
जनश्रुतियों से पता चलता है कि गुरूघासीदास बाबा जी के ग्यारहवां पीढ़ी पंजाब हरियाणा से आकर छत्तीसगढ़ में बसे उनका पहला पड़ाव जिला बलौदाबाजार के खंड भटगांव में बिंझवार जमीदार के गांव में बस गये। सतनामियों के छत्तीसगढ़ में बसने से पहले यहां मुस्लिम, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई एवं जैन धर्म का स्थापना हो चुका था इसके फलस्वरूप यहां पर विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर यथा शिव मंदिर, विष्णु मंदिर, हनुमान मंदिर, दुर्गा मंदिर, काली मंदिर एवं अनेक मठ-मंदिर तथा गुरूद्वारा मौजूद था और इसके साथ ही साथ रूढ़ीवाद एवं अंधविश्वास चरम सीमा पर था।
संवत 1787 सन् 1730 को सतखोजनदास जी के 13वां पीढ़ी, मेदनीदास जी भटगांव छोड़कर गिरौदपुरी में छेरा पुन्नी को आकर बस गये।
गिरौदपुरी में मेदनी दास का स्वर्गवास हुआ उनके पुत्र महंगुदास जी के तिसरे पुत्र के रूप में गुरू घासीदास जी का जन्म हुआ। समाज में मान्यता है कि माता अमरौतिन अपने ननकु-मनकु और घासीदास तीनों पुत्र को जन्म देकर 25 वर्ष की आयु में सतधाम (स्वर्ग) को चली गई। उस समय घासीदास जी तीन माह के शिशु थे। महंगुदास दुःखी हो गया उनके दुःख देखकर गिरौदपुर के लोगों ने सलाह मशविरा कर के गांव के सुधाराम रौतिया (गौटिया) की पुत्री कुमारी करूणा से सादी करवाई। सुधाराम काफी बुढ़े हो गये थे। सुधाराम गौटिया मेदनीदास बाबा के साथ संगत किया करते थे। कुमारी करूणा का ननकु-मनकु एवं घासीदास से बेहद लगाव बढ़ गया था। करूणा के दुलार प्यार से तीनों भाई बढ़ने लगे बाबा मंहगुदास का अकेलापन का दुःख बिसर गया। ऐसा माना जाता है कि ननकुदास जी बालपन में ही सतधाम (स्वर्ग) चले गये। मनकुदास एवं घासीदास दोनों भाईयों का वंश विस्तार आज भी मौजूद है। 

नामायण ग्रंथ की शिक्षा...


      यह सभी जानते हैं कि सत्य की हमेषा विजय होता है और सत्य ही मानव का आभूशण है, असत्य को त्याग कर सत्य को आत्मसात् करने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। अज्ञानतावष् मनुवाद के कुटिल विचारों से ग्रसित होने के कारण मानव समाज का एक विषाल समुदाय अनेक वर्शों से आडम्बर युक्त धार्मिक रूढ़ीवाद का षिकार होते आया है। सामाजिक विशमताओं का जहर पीते, थोथा एवं नीरस जीवन जीने को बाध्य रहे। संत गुरूनानक, कबीर तथा रैदास आदि ने मानव समाज में व्याप्त अज्ञानता रूपी गहन अंधकार को मिटाने एवं उन्हें सत्य रूपी प्रकाष में लाकर खड़ा कराने के प्रयास में अपना अमूल्य जीवन समर्पित कर अमरत्व प्राप्त किये, उन्होंने जन-जन के हृदय में सत उपदेषों द्वारा सद्ज्ञान को प्रकाष मय दीप प्रज्वल्लित किये। आपस में प्रेमभाव का संचार कर निःस्वार्थ भावना से प्रेरित भाईचारे की भावनाओं से जीवन जीने के लिये मार्ग प्रषस्त किये। 
संत गुरूओं, महात्माओं के ज्ञान, उपदेषों, सीखों में मानव समाज का कल्याण एवं जीवन का अमरत्व निहित होता है, उनके पद चिन्हों का अनुसरण करने तथा उनके ज्ञान, उपदेषों को आचरण में व्यवहृत करने पर सहज ही सत्य का दर्षन हो जाता है, परम् पूज्य गुरू घासीदास जी ने अपने जीवन को सत्य की षोधन में लगाये रखा। विशम् परिस्थितियों में भी उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा अंततः उन्होंने सत्य का दर्षन करने में सफलता प्राप्त किये। उनका कठोर त्याग, कठिन तपस्या, गहन षोध एवं दुर्गम साधना के फलस्वरूप ही मानव समाज में सतनाम धर्म का प्रादुर्भाव हुआ, उन्होंने जन-जन में ज्ञान के प्रकाष को फैलाते हुये सत्य के प्रति उनमें नवीन चेतना जागृत कर मानवता पर आधारित जाति विहीन समाज की स्थापना की जिसमें मानव समाज में समता पर आधारित सद्भाव एवं भाईचारे की भावनाओं का अभ्युदय हुआ। गिरौदपुर, भंडारपुरी, तेलासी, चटुआ और खड़वा धाम में आज भी सत्य का प्रमाण दृश्टव्य है। ये धाम हमें आत्मसात करने की प्रेरणा दे रहे हैं, सच्ची श्रद्धा एवं विष्वास से इन पवित्र धामों का दर्षन मात्र से प्राणियों की मनोकामना सिद्ध हो जाते हैं। 

यह सभी जानते हैं कि सत्य की हमेषा विजय होता है और सत्य ही मानव का आभूशण है, असत्य को त्याग कर सत्य को आत्मसात् करने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। अज्ञानतावष् मनुवाद के कुटिल विचारों से ग्रसित होने के कारण मानव समाज का एक विषाल समुदाय अनेक वर्शों से आडम्बर युक्त धार्मिक रूढ़ीवाद का षिकार होते आया है। सामाजिक विशमताओं का जहर पीते, थोथा एवं नीरस जीवन जीने को बाध्य रहे। संत गुरूनानक, कबीर तथा रैदास आदि ने मानव समाज में व्याप्त अज्ञानता रूपी गहन अंधकार को मिटाने एवं उन्हें सत्य रूपी प्रकाष में लाकर खड़ा कराने के प्रयास में अपना अमूल्य जीवन समर्पित कर अमरत्व प्राप्त किये, उन्होंने जन-जन के हृदय में सत उपदेषों द्वारा सद्ज्ञान को प्रकाष मय दीप प्रज्वल्लित किये। आपस में प्रेमभाव का संचार कर निःस्वार्थ भावना से प्रेरित भाईचारे की भावनाओं से जीवन जीने के लिये मार्ग प्रषस्त किये। 
संत गुरूओं, महात्माओं के ज्ञान, उपदेषों, सीखों में मानव समाज का कल्याण एवं जीवन का अमरत्व निहित होता है, उनके पद चिन्हों का अनुसरण करने तथा उनके ज्ञान, उपदेषों को आचरण में व्यवहृत करने पर सहज ही सत्य का दर्षन हो जाता है, परम् पूज्य गुरू घासीदास जी ने अपने जीवन को सत्य की षोधन में लगाये रखा। विशम् परिस्थितियों में भी उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा अंततः उन्होंने सत्य का दर्षन करने में सफलता प्राप्त किये। उनका कठोर त्याग, कठिन तपस्या, गहन षोध एवं दुर्गम साधना के फलस्वरूप ही मानव समाज में सतनाम धर्म का प्रादुर्भाव हुआ, उन्होंने जन-जन में ज्ञान के प्रकाष को फैलाते हुये सत्य के प्रति उनमें नवीन चेतना जागृत कर मानवता पर आधारित जाति विहीन समाज की स्थापना की जिसमें मानव समाज में समता पर आधारित सद्भाव एवं भाईचारे की भावनाओं का अभ्युदय हुआ। गिरौदपुर, भंडारपुरी, तेलासी, चटुआ और खड़वा धाम में आज भी सत्य का प्रमाण दृश्टव्य है। ये धाम हमें आत्मसात करने की प्रेरणा दे रहे हैं, सच्ची श्रद्धा एवं विष्वास से इन पवित्र धामों का दर्षन मात्र से प्राणियों की मनोकामना सिद्ध हो जाते हैं। 

गुरू घासीदास सतनाम मंगल आरती...


ओम जय घासीदास हरे, साहेब जै घासीदास हरे।
माया असत यम बंधन छोरत, हँसाहि पार करे।। ओम जय.....
(1) सत सुमिरत सुख होवै, पाप भगे तन का। साहेब..... 
दुख दरिद्रो मिटावै, भरम मिटे मनका।। ओम जय.....
(2) सतगुरू पूर्ण अगोचर, घट घट के बासी। साहेब..... 
काम क्रोध मद हरता, काटे यम फासी।। ओम जय.....
(3) सत्य पुरूश पुरूशोत्तम तुमहि, अगजगके स्वामी। साहेब..... 
भाव भक्ति पहिचानो सबके, तुम अन्तर्यामी।। ओम जय.....
(4) अलख पुरूश निर्वाण अगम गति, महिमा न जानी परे। साहेब .....
साधक संत सुजान भक्तजन, निषि दिन ध्यान धरे।। ओम जय.....
(5) निराकार ओंकार निरक्षर, अक्षर रूप गहे। साहेब.....
जन मन रंजन खल दल गंजन, नाम निरंजन दे।। ओम जय.....
(6) कलिमल अघदलदलन दयानिधी, सतपथ प्रकट करे। साहेब.....
सुक्ष्म वेदाचार्य ग्यानवपु, दलितोद्धार करे।। ओम जय.....
(7) सतखोजी सतलोक निवासी, सत्य संदेष कहे। साहेब.....
सत्य पुरूश के अंष रूप तुम, असत से दूर रहे।। ओम जय.....
ओम जय घासीदास हरे, साहेब जै घासीदास हरे।
माया असत यम बंधन छोरत, हँसाहि पार करे।। ओम जय.....

Friday, 12 February 2016

छत्तीसगढ़ में सतनामी....

मान.  श्री राजेंद्र जी अ. भा. सह प्रमुख (धर्म जागरण )
जगत गुरु गद्दीनशीन पूज्य श्री विजय गुरु जी, पूज्य श्री उत्तम गुरु जी 
 परम पूज्य गुरू घासीदास जी जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी रहा करते थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। उन्होंने सतनाम पंथ की स्थापना की घोषणा की। गुरू घासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया। 
गुरु घासीदास जी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा, और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है। गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे।  
जगत गुरु गद्दीनशीन पूज्य श्री विजय गुरु जी, पूज्य श्री उत्तम गुरु जी
राजमहंत सांवलराम डाहरे (विधायक अहिवारा)
गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार लगभग 4 लाख लोग उस वक्त सतनाम पंथ से थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है। गुरू घासीदास जी के अंतरध्यान होने के पष्चात उनके सतनाम आंदोलन को संचालित करने का कार्य गुरू बालकदास जी ने किया।ं अगर राजा गुरू बालकदास जी को सतनामी समाज के संविधान निर्माता कहे तो अतिसयोक्ती नही होगा। गुरू जी समाज को एकता के सूत्र में बांधने के लिये गाँव-गाँव में भंडारी, छड़ीदार, जैसे सम्मानित पदो का चुनाव किये ताकि प्रत्येक गाँव में सतनाम धर्म के रिती-रिवाजो के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान जैसे शादी-ब्याह, मरणी-दशगात्र जैसे समाजिक क्रिया क्रम सुगमता से किया जा सके। साथ ही महंत, राजमहंत जैसे सर्वोच्च सम्मानीय पदो का भी चुनाव योग्यता और समाजिक अनुभव को आधार मानते हुये किये इससे यह हुआ कि पुरा समाज गुरू से जुड़े रहे। दुसरी तरफ गुरू जी के बड़े भाई अध्यात्मीक गुरू के नाम से जाने, जाने वाले गुरू अमर दास जी ने सतज्ञान और सतमहिमा को आधार मानते हुये लोगो को सतनाम से जोड़ने का अनुकरणीय कार्य किये। जैतखाम, चैका पूजा, गुरू गद्दी, पंथी आदि के माध्यम से, साथ ही रामत, रावटी करके भी समाज को जागृत करने के लिये गुरूजनो ने अपना सारी ताकत झोक दिये जिसका नतीजा यह निकला कि समाज में आपसी एकता और धार्मिक सहिष्णुता की भावना लोगो की मन में कुट-कुट कर समाहित होने लगी। 
जगत गुरु गद्दीनशीन पूज्य श्री विजय गुरु जी, पूज्य श्री उत्तम गुरु जी
गुरू बालकदास जी एवं गुरू अमरदास जी के जीवन चरित्र को जाने समझे बिना उनके षौर्य शक्ति का उचित आकलन नही किया जा सकता, गिरौदपुरी, भंडारपुरी, तेलासी, खड़ुवा, चटुवा, खपरी, कुँआ बोड़सरा, कुटेला, पचरी आदि धामो का इतिहास जो आज भी लोगो के जबान में यथावत है उन सच्ची घटनाओ को लिपी बद्ध करके हमें अपने गुरू जनो के अद्भुत कार्य को सम्मानित करना होगा जिसके द्वारा हमारे आने वाले पिढ़ी भी हमारे समाज की सच्ची गौरव गाथा को जान सके। यह कार्य हम सभी पढ़े लिखे साथियों का फर्ज है जिसे पूरा करना ही होगा। साथियों कानूनी रूप से संविधान में हमारे सतनाम धर्म को कोई अलग स्थान नही दिया गया है बल्कि हिन्दू धर्म के साथ जोड़ा गया है, जिसका हमारे सतनाम धर्म के अनुयायी पालन करते आ रहे है। अंग्रेजों ने हमारे बीच मतभेद पैदा करने के लिए हमे ऐसे जाति के अंतर्गत रखा है जिसका नाम तक लेने में सतनामी अपने आपको अपमानित महसुस करता है और इसी लिये स्वतंत्र जाति बनाने के लिये सन् १९२६ गुरूओं के द्वारा प्रयास किया गया। 
मान.  श्री राजेंद्र जी अ. भा. सह प्रमुख (धर्म जागरण )जगत गुरु गद्दीनशीन पूज्य श्री विजय गुरु जी, पूज्य श्री उत्तम गुरु जी
राजमहंत सांवलराम डाहरे (विधायक अहिवारा)
सतनामी जाति कि मान्यता के लिये गुरू अगमदास साहेब, राजमहंत रतिराम एवं राजमहंत श्री नैनदास महिलांग जी के द्वारा सी. पी. बरार के गवर्नर सर मान्टेग्यू बटलर से आदेशित पारित करवाया गया। सभी जानते है बिना सबूत दिये कोई आसानी से यह कार्य नही करवाया गया होगा।  उसके बावजूद भी संविधान में हमें हिन्दू ही माना गया है। 


सत संदेश


हे मानव समाज,



यह शरीर नाशवान है, जन्म लेता है, जीता है और अंत में मर जाता है, दुनिया वाले उसे भूल जाते हैं, परंतु जो व्यक्ति असत्य को त्याग कर एवं सत्य को अंगीकार कर लोक मंगल से युक्त लोकहित में सार्थक कार्य सम्पादित करता है वह इस संसार में अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। लोकहित में जन जागरण का कार्य भले ही कठिन हो परंतु पीछे पग धरने में उससे बड़ी कायरता है, सिर्फ अंधभक्ति करने से ही मानव समाज का कल्याण नहीं हो सकता। अतः हम सब मिलकर लोकहित में ऊंच-नीच एवं स्वार्थ की भावनाओं से परे एक ऐसा जाति विहित समाज का निर्माण करें जिसमें शिक्षाद्व ज्ञान, सद्भाव, समभाव एवं आपस में भाईचारे की भावनाओं का समावेष हो। 

आईये हम पषुता का त्याग कर मानवता को धारण कर जनहित में अपना कदम बढ़ावें और परम पूज्य गुरू घासीदास जी के लोक मंगलकारी सत उपदेषों को जन-जन तक पहुंचाने के लिये समाज में नव जागरण लाने के प्रयास में जुट जावें इसी अभिलाशा के साथ ..............

सत्येनाकः प्रतपति सत्ये तिश्ठते मेदिनी।
सत्यं चोक्तं परो धर्माः स्वर्गः सत्ये प्रतिश्ठितः।।
अष्वमेध सहस्तं च सत्यं च तुलया घृतक।
अवष्मेध सहंषुद्धि सत्यमेव विषिश्यते।।
(मार्कण्डे 8/41/48)


सत्यमेव जयति नानृतं, सत्येन पन्था वितो देवयानः।

येना क्रमन्त्यृपयोह्याप्त कामा, यत्र सत्सत्यस्य परमं विधानम्।।
(मुण्डकोपनिशद 3/1/3)





सत्यमेव जयति नानृतं, सत्येन पन्था वितो देव यानः।
येना क्रमन्यृपयो हृयाप्त कामा, यत सत्यत्यस्य परमं विधानम्।। 
(मुण्डकोपनिशद् 3/1/6)

                                                                                                               

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